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अदालतों की संख्या पर्याप्त नहीं

सुप्रीम न्यायालय ने बुधवार देर रात विशेष सुनवाई करते हुए कांग्रेस पार्टी की याचिका को खारिज कर दिया  गुरूवार की प्रातः काल होने वाले बीएस येदियुरप्पा के शपथ ग्रहण पर रोक लगाने से मना कर दिया. आधी रात को सुनवाई कर निर्णय करने का यह कोई पहला मामला नहीं था. इससे पहले भी कई मामलों में आधी रात को न्याय हुआ है.

 Image result for देशभर की अदालतों में करोड़ों मुकदमे इसलिए कर रहे हैं सुनवाई का इंतजार

लेकिन बड़ा सवाल ये है कि जब करोड़ों की संख्या में मुकदमे देशभर की अदालतों में सुनवाई की तारीख का इंतजार कर रहे हैं तो यह कितना न्यायोचित है कि सिर्फ कुछ विशेष मामलों की ही सुनवाई आधी रात को की जाए. आइए जानते हैं राष्ट्र की अदालतों में कितने मामले लंबित हैं.

सुप्रीम कोर्ट 

आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक हिंदुस्तान में हिंदुस्तान की सर्वोच्च न्यायालय में हजारों की संख्या में मुकदमे लंबित हैं जबकि निचली अदालतों में ये संख्या करोड़ों में है. सुप्रीम न्यायालय में 4 मई 2018 तक कुल 54,013 मुकदमे लंबित हैं.

हाईकोर्ट

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मंत्रालय द्वारा संकलित आंकड़ों के मुताबिक देशभर के 24 न्यायालय में वर्ष 2016 के आखिर तक लंबित मुकदमों की संख्या 40.15 लाख थी.

जिला अदालत 

देशभर की जिला एवं अधीनस्थ अदालतों में ढाई करोड़ से ज्यादा मुकदमों की सुनवाई नहीं हुई है.कानून राज्य मंत्री पीपी चौधरी ने राज्यसभा में 9 मार्च 2018 को एक सवाल के लिखित जवाब में बताया कि 2,65,05,366 मुकदमे लंबित पड़े हैं.

मुकदमे लंबित रहने की मुख्य वजहें

जजों की संख्या पर्याप्त नहीं 

उच्चतम कोर्ट में न्यायाधीशों के स्वीकृत 30 पदों में से छह खाली हैं.

उच्च न्यायालयों में 1048 पदों में 406 पद खाली हैं.

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जिला एवं अधीनस्थ अदालतों में न्यायिक अधिकारियों के 5746 पद खाली पड़े हैं.

जजों की संख्या बेहद कम है. मौजूदा समय में करीब 21 हजार जज है. जनसंख्या अनुपात के हिसाब से अभी हर एक लाख लोगों पर एक जज हैं. 1987 में कानून आयोग की रिपोर्ट की सिफारिश के मुताबिक हर एक लाख लोगों पर कम से कम 5 जज होने चाहिए. जबकि 1987 से अब तक राष्ट्र की आबादी 25 करोड़ से ज्यादा बढ़ चुकी है.

अदालतों की संख्या पर्याप्त नहीं

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1. इंडियन न्यायपालिका के पास संसाधन पर्याप्त नहीं हैं. केंद्र  राज्य दोनों सरकारें न्यायपालिका के विषय में खर्च बढ़ाने में रुचि नहीं रखते हैं.

2. पूरे न्यायपालिका के लिए बजटीय आवंटन पूरे बजट का एक महज 0.1% से 0.4% है. जो बेहत निराशाजनक है.

3. हिंदुस्तान में अधिक अदालतों  अधिक बेंच की आवश्यकता है.

4. आधुनिकीकरण  कम्प्यूटरीकरण सभी अदालतों तक नहीं पहुंच पाया है.

5. निचली अदालतों में न्यायिक गुणवत्ता कम है.

6. इंडियन न्यायिक व्यवस्था बेहतरीन दिमागों  प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को आकर्षित करने में बुरी तरह विफल रही है.

7. चूंकि निचली अदालतों में न्यायाधीशों के निर्णय से संतुष्ठ नहीं होने पर लोग उच्च न्यायालयों में फैसलों के विरूद्ध अपील दायर करते हैं, जिससे फिर मुकदमों की संख्या बढ़ जाती है.

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